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राग वर्णन भाग – १

राग-वर्णन-भाग-१

राग वर्णन

भाग – १

१) बिलावल – यह उत्तरान वादी राग है। यह राग कल्याण राग के समान दिखाई देता है, अत इसे प्रात काल का कल्याण भी कहते हैं।

२) अल्हैया बिलावल – बिलावल राग से ही अल्हैया बिलावल की उत्पत्ति हुई है। अवरोह में कोमल निषाद का थोड़ा सा प्रयोग इसके सौंदर्य को बढाता है। निषाद और गान्धार इसमे वक्र है |

३) खामाज – इस राग के आरोह में धैवत कुछ दुर्बल रहता है। आरोह में तीव्र और अवरोह में कोमल निषाद लिया जाता है। इस राग का वैचित्र्य ग म प नि इन चार स्वरों पर निर्भर है। आरोह में पंचम स्वर पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। इसी लिये कोई-कोई गायक ग म ध नि सां, इस प्रकार पंचम छोड़कर भी तानें लेते देखे जाते हैं तथा कोई-कोई ग म प नि सां इस प्रकार स्वर लेते हैं।

४) यमन – यह पूर्वांग वादी राग है। कभी-कभी इसमें कोमल मध्यम का प्रयोग भी विवादी स्वर के नाते कर दिया जाता है, तब कुछ लोग उसे यमन कल्याण कहते हैं।

५) काफी – कभी-कभी इसके आरोह में तीव्र गन्धार और तीव्र निषाद लेकर इसमें विचित्रता पैदा की जाती है। इस राग का वैचित्र्य सा ग प नि इन स्वरों पर बहुत कुछ अवलम्बित है।

६) भैरवी – इस राग का गायन समय प्रात काल है, किन्तु कुछ संगीत तज्ञ इसे सर्वकालिक राग मानकर चाहे जिस समय गाते बजाते हैं। कोई-कोई गायक इसमें रे-म-नि इन तीव्र स्वरों का प्रयोग विवादी स्वर के नाते करते हैं, किन्तु इस कार्य में सावधानी की आवश्यकता है ।

७) भूपाली – यह बहुत सरल और मधुर राग है। गाते समय इसे शुद्ध कल्याण, जेत कल्याण और देसकार से बचाने में कुशलता की आवश्यकता है, यह केवल ५ स्वरों का अपने ढंग का स्वतंत्र राग है।

८) शुद्ध सारंग – इस राग का उल्लेख हृदय प्रकाश व हृदय कौतुक ग्रन्थ में पाया जाता है। मध्यमाद सारंग में धैवत वर्जित है, किन्तु शुद्ध सारंग में धैवत लगता है, इस लिये यह राग उससे अलग अपना अस्तित्व रखता है। गौड़ सारंग से भी यह बिल्कुल अलग है क्योंकि गौड सारंग कल्याण थाट का है और यह काफी थाट का है। इसी प्रकार नूर सारंग से भी यह बचालिया जाता है क्योंकि नूर सारंग में शुद्ध मध्यम नहीं है।

९) बिहाग – इसके आरोह में तो रे – ध वर्जित हैं ही, किन्तु अवरोह में रे ध अधिक प्रबल नहीं रखने चाहिए वरना बिलावल की छाया दीखने का भय रहता है। विवादी स्वर के नाते कभी-कभी इसमें तीव्र मध्यम का भी प्रयोग देखने में आता है। अवरोह में निषाद से पंचम पर आते समय तथा गन्धार से षडज पर आते समय कुशलता से चलना चाहिए।

१०) हमिर – इस राग में तीव्र मध्यम का प्रयोग आरोह में थोड़ा सा करना चाहिए, शुद्ध मध्यम आरोह अवरोह दोनों में है। इस राग के अवरोह में कमी-कभी धैवत से पंचम पर आते समय ध नि प इस प्रकार कोमल निषाद का प्रयोग विवादी स्वर के नाते देखने को मिलता है कोई-कोई गुणी इसमें पंचम वादी मानते हैं, किन्तु भातखण्डे जी के मतानुसार इसका वादी स्वर धैवत ही ठीक है।

Bhartiya Sangeet Kalapith Author
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