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काव्य तथा संगीत की तुलना

काव्य-कि-तुलना

चूंकि काव्य का आधार शब्द है तथा शब्द एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिससे व्यक्ति भावों को, इच्छाओं को अभिव्यक्त करता है। इस बात को कोई नकार नहीं सकता कि दैनिक कार्यों में सर्वाधिक योग भाषा का होता है। यही कारण है कि कुछ विचारक काव्य को कलाओं में सर्वश्रेष्ठ कला मानते हैं। हीगल, श्यामसुन्दरदास, शुक्लजी तथा प्रसादजी इसी श्रेणी के विचारक हैं।

आचार्य शुक्ल तथा प्रसादजी ने काव्य के पक्ष में कहा है कि प्राचीन समय में ‘विद्या’ तथा ‘उपविद्या’ नामक एक विभाजन था और प्राचीन आर्यों ने काव्य को 64 कलाओं में नहीं रखा था, वह विद्या माना जाता था । जबकि 64 कलाएँ उपविद्या कहलाती थीं और संगीत कला होने के कारण उपविद्या था। अतः काव्य को संगीत से श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था। इसके अतिरिक्त काव्य के पक्ष में ये विचारक कहते हैं कि काव्य बाह्य तथा आंतरिक दोनों ही परिस्थितियों का सफल चित्रण करने में सक्षम है। भावों के साथ – साथ घटनाओं तथा पदार्थों की सजीव अवतारणा इसमें संभव है।

शुक्ल जी के मतानुसार “सर्वश्रेष्ठ मानव भावना कोमल भावना है, जिसकी अभिव्यक्ति काव्य ही कर सकता है।”

उपरोक्त तर्क में कही गयी बातें असत्य नहीं हैं, काव्य में बहुत शक्ति होती है पर इस कारण वे संगीत के प्रभाव को गौण स्थान दें, यह उचित नहीं है। संगीत की अपनी विशेषता है, उसका विस्तृत प्रभाव क्षेत्र है, अतः उसके प्रभाव को हमें कम नहीं समझना चाहिए। काव्य में भी नाद (संगीत), चाहे कम स्वरों का प्रयोग हो पर प्रयोग होता है। काव्य की सार्थकता व प्रभावकारिता उसके गेय रूप में है पर संगीत शब्दों के अधीन नहीं है। संगीत कला का सबसे सूक्ष्म माध्यम है।

उपरोक्त विचारधारा के अलावा एक अन्य विचारधारा है, जिसमें काव्यकला तथा संगीतकला दोनों को समान श्रेणी का मानते हैं। इस मत के अनुसार काव्य तथा संगीत दोनों का आधार नाव है। अन्तर केवल यह है कि जब नाद संगीत प्रधान (स्वर-प्रधान) हो तब संगीत है और जब वह भाव (शब्द) प्रधान हो तब काव्य होता है। काव्य में यदि सांगीतिक लय (धुन, उतार-चढ़ाव) न हो तो वह भाषण मात्र होगा। यही कारण है कविता और निबन्ध तथा अकवित्वपूर्ण सामग्री को पद्य तथा गद्य नामों से जाना जाता है। काव्य में संगीत सम्मिलित है। इसी तरह संगीत में शब्द मिले रहते हैं। गीत, नृत्य, तबले अथवा पखावज के बोल, नोम तोम चाहे अर्थहीन हों पर शब्द हैं। अतः दोनों में दोनों हैं। पंतजी ने कहा है –

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान ।

उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान ।।

संस्कृत साहित्य में संगीत, काव्य, दोनों को ‘सरस्वती के स्तनद्वय’ कहा गया है। दोनों की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है, अतः दोनों की श्रेष्ठता समान है। मिल्टन ने कहा है कि ‘काव्य तथा संगीत परस्पर बहिनें हैं।’

Bhartiya Sangeet Kalapith Author
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