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पं. सामता प्रसाद उर्फ गुदई महाराज जी

पं-समता-प्रसाद

पं. सामता प्रसाद का जन्म १९ जुलाई, १९२० को वाराणसी के कबीर बौरा नामक मुहल्ले में व्यावसायिक संगीतज्ञों के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके पिता पं. बाचा मिश्र अपने समय के प्रसिद्ध तबला वादक थे, अतः गुदई महाराज की आरंभिक शिक्षा इन्हीं के द्वारा हुई। किंतु जब ये मात्र ८ वर्ष के थे, तभी पिता का निधन हो जाने के कारण इनकी शेष शिक्षा का दायित्व बनारस घराने के प्रकांड विद्वान पं. विक्रमादित्य मिश्र उर्फ खलीफा बिक्कू महाराज जी ने अपने ऊपर ले लिया जो रिश्ते में इनके मौसरे भाई भी थे। पं. सामता प्रसाद का घर में बुलाने का नाम गुदई था।

पं. बिक्कू महाराज की गहन देख-रेख में १५-१६ वर्षों तक १२-१४ घंटे प्रतिदिन के अभ्यास से इनके तबला वादन में अद्भुत और अनोखे कसबल का समावेश हो गया। उलटा बायाँ (स्याही का भाग अपनी ओर) का वादन और चमत्कृत करती तैयारी ने इन्हें अभूतपर्व लोकप्रियता दिलवाई। गुणी तबला वादकों के साथ- साथ जन साधारण को सम्मोहित करने की कला में भी वह प्रवीण थे। तंत्र वाद्यों एवं नृत्य की संगति के साथ-साथ एकल वादन में भी वह दक्ष थे। पं. सामता प्रसाद के पास अच्छे बोलों का अच्छा भंडार था। लेकिन अपनी युवावस्था में जन साधारण को आकर्षित करने के उद्देश से इन्होंने साधारण बोलों के वादन में असाधारण निपुणता हासिल की। तिरकिट, धिरधिरकिटितक, धिनगिन और तकतक जैसे सामान्य बोलो का वादन करके उन्होंने आम संगीत प्रेमियों के दिलों में अपना असामान्य स्थान बनाया था। यही कारण है कि उनके तबले का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोलता था । अपने समकालीन तबला वादकों में वे सर्वाधिक लोकप्रिय थे ।

१९४२ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में इन्हें पहला बड़ा अवसर मिला, जहाँ इन्हें उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के साथ संगति का सुयोग प्राप्त हुआ । इस कार्यक्रम की सफलता ने इन्हें फिर कभी पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं दिया। दिल्ली के विज्ञान भवन में इनका अद्भुत तबला वादन सुनकर रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति खुश्चेव इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने मई दिवस के अवसर पर रूस में उन्हें आमंत्रित किया। जहाँ विश्व के अनेक नेताओं ने इनके चमत्कारी वादन का रसास्वादन किया। यहाँ से पं. सामता प्रसाद अर्न्तराष्ट्रीय संगीताकाश में छाते चले गए । शायद ही कोई ऐसा महत्त्वपूर्ण कलाकार हो, जिसने इनके साथ कार्यक्रम देने का लोभ न किया हो । गुदई महाराज के तबला वादन का लाभ फिल्मी दुनियाने भी खूब उठाया । झनक झनक पायल बाजे, मेरी सूरत तेरी आँखे, बसंत बहार, किनारा, मेहबूबा, शोले, सूरेर प्यासी, असमाप्त कविता, जलसाघर और नवाब वाजिद अली शाह जैसी अनेक फिल्मों को अपने तबला वादन की रंगीन छटा प्रदान की थी उन्होंने । रसपूर्ण चमत्कारिक वादन पंडितजी की बहुत बड़ी विशेषता थी। इसीलिए व्ही. शांताराम, वसंत देसाई और आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों को जब असाधारण तबले की जरूरत पड़ती थी तो वे पंडितजी को ही याद करते थे। फिल्म मेरी सूरत तेरी आँखों में मोहम्मद रफी के “गीत नाचे मन मोरा मगन तिग्धा बाजे” में नटराज गोपीकृष्ण और पं. चौबे महाराज के युगल नृत्य की संगति के लिए सिर्फ वे ही सक्षम सिद्ध हुए । किनारा फिल्म में उनके धिरधिरकिटित्तक का अंदाज अलग ही दिखता है। वह दूसरों के लिए आकाश कुसुम है और इसीलिए ‘शोले’ फिल्म में घोडों की टाप और तांगे की ध्वनि के लिए संगीतकार आर डी. बर्मन को उन्हीं की शरण में जाना पड़ा था। आर.डी. बर्मन ने उनसे तबला सोखा भी था। उन्हें अपने जीवन में अनेक मान-सम्मान और उपाधियाँ मिली। उनमें से कुछ प्रमुख है तबला का जादूगर, ताल मार्तंड, ताल शिरोमणी, तबला विजार्ड, ताल विलास, तबला सम्राट, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, हाफिज अली खाँ सम्मान, पद्मश्री और पद्मभूषण तथा कई अन्य। इनके प्रमुख शिष्यों में इनके सुपुत्र पं. कुमार लाल मिश्र और कैलाश नाथ मिश्र सहित डॉ. ए.के. भट्टाचार्य, जे. मेसी, पार्थसारथी मुखर्जी, सुखमय बॅनर्जी, मुदित नारायण और स्व. सत्यनारायण वशिष्ठ एवं चंद्रकांत कामथ आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है। जीवन के अंतिम क्षणों तक सांगीतिक मंचों पर सक्रिय रहे कर्मयोगी सामता प्रसाद तबला कार्यशाला में भाग लेने पुणे गए हुए थे। वहीं उन्हें दिल का जान लेवा दौरा पड़ा और ३१ मई, १९९४ को वह चिरनिद्रा में लीन हो गए।

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