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फक़ीरउल्ला

फक़ीरउल्ला

फ़क़ीरउल्ला औरंगजेब के शासनकाल में कश्मीर के सूबेदार थे। वह भारतीय संगीत को बहुत्त सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उन्हें (ईरानी) फ़ारसी संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान था। सम्राट औरंगजेब के प्रति उनकी प्रगाढ़ आस्था थी। फ़क़ीरउल्ला के जन्म आदि के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन प्राप्त नहीं होता, किन्तु यह निश्चित है कि यह विद्वान् सन् 1700 ई. में औरंगजेब के शासनकाल में हुआ था। इसके शासनकाल में हृयात् रब्बानी, शेख कमाल आदि प्रसिद्ध संगीतज्ञ फ़क़ीरउल्ला के आश्रय में थे। महाराज मानसिंह की संगीत सेवाओं से फ़क़ीरउल्ला बहुत प्रभावित थे। यह उल्लेखनीय है कि महाराजा मानसिंह के शासनकाल में ‘मानकुतूहल’ नामक ग्रंथ की रचना हुई थी। इस ग्रंथ को पढ़कर फ़क़ीरउल्ला बहुत प्रभावित हुए तथा उन्होंने मानकुतूहल ग्रंथ का फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया, एवं उसका नाम ‘रागदर्पण’ रखा। इस ग्रंथ में फ़क़ीरउल्ला ने जगह-जगह पर अपनी टिप्पणियां भी दी हैं। फ़क़ीरउल्ला का मानना था कि उनके इस ग्रंथ से भारतीय संगीत के सुप्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र, संगीत रत्नाकर, संगीत दर्पण इत्यादि को पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मानकुतूहल का अनुवाद फ़क़ीरउल्ला ने तीन वर्ष में किया। उन्होंने भारतीय संगीत के कई रागों की तुलना ईरानी संगीत से की है उदाहरणार्थ-ईरानी संगीत का ‘गिज़ाल’ भारतीय संगीत के ‘षट्राग’ से मिलता है। ‘दरगाह ‘ ‘शुद्धतोड़ी’ से मिलता है। ‘नैरोज़’, ‘कल्याण’ से मिलता है। ‘इराक’ ‘पूरियाधनाश्री’ से मिलता है।

फ़क़ीरउल्ला भारतीय संगीत को धार्मिक दृष्टि से ही सदैव आंकते थे। अपने सम्राट औरंगजेब के प्रति उसकी दृढ़ आस्था थी। जिन दिनों वह कश्मीर का सूबेदार था, उन दिनों रागों की फ़ारसी नग़मों से तुलना करके सामंजस्य-स्थापन का संकल्प भी उसने संजोया था। फ़क़ीरउल्ला के इस ग्रंथ से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि औरंगजेब के दरबार से संगीत का बहिष्कार नहीं हुआ था।फ़क़ीरउल्ला ने राग दर्पण में औरंगजेब के काल के अनेक गायक और वादकों का परिचय दिया है। वहां यह भी उल्लेख मिलता है कि औरंगजेब के प्रसिद्ध दरबारी संगीतज्ञ पुरुष नयन एवं सुखीसेन सम्राट के विशेष कृपापात्रों में से थे। इनके अतिरिक्त कई अन्य गायक तथा वादक औरंगजेब के दरबार में नियुक्त थे। फ़क़ीरउल्ला बहुत उदार प्रकृति के तथा मौजी स्वभाव के थे। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी, इस कारण संगीतज्ञों को बहुत सम्मान देते थे। अपने जीवन में उन्होंने जो कुछ धन कमाया उस सबको संगीतज्ञों की सेवा में अर्पित कर दिया।

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