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उ.अमीर खुसरो

अमीर-खुसरो

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो का वास्तविक नाम अबुलहसन था। इनके पिता का नाम सैफुद्दीन महमूद था। जोकि लाचीन निवासी तुर्क थे। यह सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश और उसके उत्तराधिकारियों के समय उच्च पदों पर नियुक्त रहे। इनकी मां ब्रजवासी महिला थीं इनकी मातृभाषा हिन्दी थी।

अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई. में उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित पटियाली नामक ग्राम में हुआ था। इस प्रकार यह पितृ परम्परा से तुर्क और मातृ परम्परा से बृजवासी हिन्दू थे। 1264 ई. में इनके पिता एक युद्ध में मारे गये इस कारण इनका लालन-पालन अपने नाना के संरक्षण में हुआ।अच्छे लेखन के खुसरो के गुरु सादुद्दीन मुहम्मद थे।इनकी प्रतिभा निखरकर सामने आयी यह बाल्यकाल में ही शैख निजामुद्दीन के शिष्य हो गये थे। इन्होंने फारसी, तुर्की और अरबी के अतिरिक्त हिन्दी का भी अध्ययन कर लिया था। अमीर खुसरो ने बलवन के भतीजे अलाउद्दीन किशली खां के दरबार में और बलवन के कनिष्ठ पुत्र बुगरा खां के दरबार में नौकरी कर ली, फिर खुसरो बलवन के ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मुहम्मद के साथ होकर मुलतान चले गये। शाहजादा मुहम्मद 1284-85 ई. में मुगलों के हाथ से मारा गया और खुसरो को मुगलों के हाथों बन्दी बनना पड़ा, फिर यह बन्दीगृह से भागकर ग्यासुद्दीन बलवन के पास पहुंचे; और शाहजादा मुहम्मद की मृत्यु का शोक-काव्य बलवन को सुनाया। यह सुनकर बलवन इतना रोया कि उसे ज्वर आया और उसकी मृत्यु हो गयी। चढ़ बलवन की मृत्यु के पश्चात् यह अली जामदार के आश्रित रहे, और इनके साथ अवध चले गये। 1288 ई. में इन्हें कैकुबाद ने बुला लिया और ये शाही दरबार के आश्रित हो गये। जलालुद्दीन खिलजी के युग में खुसरो की नियुक्ति बादशाही पुस्तकालय के अध्यक्ष के स्थान पर हुई। कुतुबुद्दीन खिलजी के दरबार में इन्हें बड़ा सम्मान मिला और गयासुद्दीन तुगलक के साथ 1324 ई. में यह भी बंगाल चले गये और इसी वर्ष निजामुद्दीन के स्वर्गवास के पश्चात् 1325 ई. में अमीर खुसरो भी स्वर्गवासी हो गये।

कायाँ का योगदान सुल्तान की महफिल में खुसरो नई-नई गजलें प्रस्तुत करते थे। अलाउद्दीन खिलजी के युग में भी यह खुसरो दरबार से सम्बन्धित रहे। जलालुद्दीन खिलजी के हत्यारे अलाउद्दीन खिलजी की प्रशंसा तो खुसरो ने की। उस घृणित हत्या से कहीं शैख़ बू अली कलन्दर जैसे प्रभावशाली सन्त रुष्ट न हों, अतः गा-बजाकर कलन्दर को रिझाने का काम भी अमीर खुसरो ने बड़ी कुशलतापूर्वक किया।

दौलतशाह द्वारा उद्धृत एक क़तअ में खुसरो ने कहा है कि मेरी सांगीतिक रचनाएं तीन जिल्दों में आयेंगी, परन्तु आज खुसरो द्वारा प्रणीत कोई संगीत ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैमुल्तान से लौटने के पश्चात् खुसरो ने लिखा है कि मुर ईरानी संगीत के चार उसूलों-बारह पदाँ तथा सूक्ष्म रहस्य का ज्ञान है। भारतीय संगीत के विषय में अमीर खुसरो ने कहा कि संसार के किसी भी देश के संगीत को भारतीय संगीत के समान नहीं कहा जा सकता। यहां का संगीत मन तथा प्राणों में ज्वाला भड़का देता है और पशु-पक्षियों को भी मोहित करता है। संसार के विभिन्न भागों से लोग यहां संगीत सीखने आये पर वर्षों प्रयत्न करने पर भी वे सफल नहीं हुए। जानी के अनुसार इन्होंने 99 ग्रन्थ लिखे उनमें से कुछ ही उपलब्ध हैं। जिनमें कुछ साहित्यिक और कुछ ऐतिहासिक हैं।

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