दीप और नाद: दीपावली में भारतीय संगीत
दीया और स्वर: अँधेरे से लड़ने वाले दो साथी
अमावस्या की रात सबसे काली होती है। और ठीक उसी रात भारत अपना सबसे उजला उत्सव मनाता है। यह संयोग नहीं, एक दर्शन है — कि रोशनी की ज़रूरत वहीं सबसे अधिक होती है जहाँ अँधेरा सबसे गहरा हो।
संगीत भी यही काम करता है। दीया बाहर का अँधेरा हटाता है, स्वर भीतर का। एक मिट्टी के दीये की काँपती लौ और तानपुरे का पहला षड्ज — दोनों में एक ही विनम्रता है। दोनों छोटे हैं, पर दोनों आसपास की पूरी हवा बदल देते हैं।
हमारी परंपरा ने इन दोनों को कभी अलग नहीं माना। नाद को ब्रह्म कहा गया और ज्योति को परमात्मा का प्रतीक। इसलिए दीपावली को केवल रोशनी का पर्व कहना अधूरा है। यह उतना ही स्वर का पर्व भी है — बस हमने उसे सुनना कम कर दिया है।
आरती: जहाँ ज्योति और नाद एक साथ जागते हैं
ज़रा अपने घर की लक्ष्मी-पूजा को याद कीजिए। थाली में दीया जलता है, और उसी क्षण घंटी बजती है, शंख गूँजता है, और पूरा परिवार एक स्वर में आरती गाने लगता है। आरती शायद हमारे जीवन का सबसे पुराना और सबसे सरल “संगीत-समारोह” है।
इसमें कोई मंच नहीं, कोई श्रोता नहीं — सब गायक हैं। दादी का काँपता हुआ स्वर, बच्चों की ऊँची आवाज़, पिता का थोड़ा बेसुरा पर पूरे मन से गाया हुआ अंतरा। संगीत की कक्षा में इसे “सुर में न होना” कहेंगे। पर आरती में सुर से बड़ा भाव होता है, और भाव से बड़ा साथ।
ध्यान दीजिए, आरती में दीया घुमाया जाता है और ताली लय देती है। प्रकाश की गति और स्वर की गति एक ही वृत्त में चलती हैं। जो बात संगीत-शास्त्र ग्रंथों में समझाता है, वह हर घर की आरती बिना कहे सिखा देती है।
राग दीपक: किंवदंती की लौ और इतिहास का सच
दीपावली और संगीत की बात हो और राग दीपक का नाम न आए, यह संभव नहीं। किंवदंती कहती है कि अकबर के दरबार में तानसेन ने राग दीपक गाया और बुझे हुए दीये अपने-आप जल उठे। साथ ही गायक का शरीर इतना तपने लगा कि उसे शांत करने के लिए राग मल्हार गाना पड़ा।
यह कथा सुंदर है, और इसे सुनाते रहना चाहिए। पर ईमानदारी यह कहती है कि यह किंवदंती है, ऐतिहासिक तथ्य नहीं। स्वरों से आग नहीं लगती — पर स्वर हृदय में आग अवश्य लगा सकते हैं। इस कथा का असली संदेश यही है कि सच्चा संगीत भीतर कुछ जला देता है: आलस्य, अहंकार, उदासी।
एक और सच जानने योग्य है। आज “दीपक” नाम से जो राग मिलते हैं, उनके स्वरूप पर विद्वान एकमत नहीं हैं, और यह राग मंचों पर बहुत कम सुनाई देता है। जिस राग से दीये जलने की कथा जुड़ी है, वही राग आज सबसे कम जलता है — यह विडंबना हमारे लिए एक प्रश्न भी है और एक निमंत्रण भी।
गोधूलि के राग: जब दीये जलने लगते हैं
लक्ष्मी-पूजन प्रायः संध्या के बाद, प्रदोष काल में होता है। हिंदुस्तानी संगीत में यह समय सबसे रहस्यमय माना गया है — दिन और रात के मिलन का समय, जिसे संधिप्रकाश कहते हैं। इसी बेला के लिए हमारे पूर्वजों ने कुछ सबसे गहरे राग रचे।
पूरिया धनाश्री में साँझ की हल्की उदासी है, जैसे दिन विदा ले रहा हो। मारवा में एक बेचैनी है — कोमल ऋषभ बार-बार किसी खोई चीज़ को ढूँढता-सा लगता है। श्री राग में गंभीरता है, मानो कोई प्राचीन मंदिर का द्वार खुल रहा हो।
और जब पूरे आँगन में दीये जल चुके हों, तब रात के पहले प्रहर का राग यमन आता है। तीव्र मध्यम वाला यमन अपनी कोमलता में भी उजला है — ठीक उस दीये की तरह जिसकी लौ तेज़ नहीं, पर स्थिर है। इस दीपावली, पूजा के बाद पाँच मिनट यमन सुनकर देखिए। रोशनी कुछ और गहरी लगेगी।
दिवाली पहाट: भोर का उजाला, भोर के राग
महाराष्ट्र ने दीपावली को एक अनोखा संगीत-उपहार दिया है — “दिवाली पहाट”। दीपावली की सुबह, अँधेरे में ही लोग उठते हैं, उबटन और अभ्यंग-स्नान होता है, और फिर किसी मैदान, मंदिर या सभागार में भोर की संगीत-सभा सजती है। पिछले कुछ दशकों में यह परंपरा महाराष्ट्र के नगरों से निकलकर अनेक शहरों तक पहुँची है।
इन सभाओं में सुबह के राग गूँजते हैं। भैरव की गंभीरता, ललित का रहस्य, तोड़ी की करुणा, अहीर भैरव की मिठास। फिर अभंग और भक्तिगीत आते हैं, जिनमें श्रोता भी धीरे-से साथ गाने लगते हैं।
सोचिए, कितना सुंदर संतुलन है। रात को दीये, सुबह को राग। रात बाहर रोशनी करती है, सुबह भीतर। जो शहर पटाखों के शोर से थका हुआ उठता है, उसे दिवाली पहाट याद दिलाती है कि उत्सव का सबसे गहरा रूप शोर नहीं, सुर है।
संतों का दीया: मीरा और कबीर की लक्ष्मी
दीपावली लक्ष्मी का पर्व है, और हम लक्ष्मी को प्रायः धन से जोड़ते हैं। पर हमारे संत-कवियों ने इस धन की परिभाषा ही बदल दी। मीराबाई गाती हैं — “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो”। जिस धन को चोर न ले जाए, जो ख़र्च करने पर भी बढ़ता जाए, वही सच्ची लक्ष्मी है।
संगीत भी ऐसा ही धन है। जितना बाँटो, उतना बढ़ता है। गुरु शिष्य को राग देता है और स्वयं ग़रीब नहीं होता; शिष्य आगे किसी और को देता है और परंपरा समृद्ध होती जाती है।
कबीर का दीया और भी भीतर जलता है:
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥
हर सच्चा कलाकार इस दोहे को जीता है। जब तक गायक “मैं गा रहा हूँ” के भाव में है, संगीत पूरा नहीं खिलता। जिस क्षण “मैं” मिटता है और केवल स्वर बचता है, उसी क्षण भीतर का दीपक जल उठता है।
इस दीपावली, एक दीया रियाज़ का
हर साल हम घर की सफ़ाई करते हैं, नए कपड़े लेते हैं, दीयों की कतार लगाते हैं। इस बार एक दीया और जलाइए — रियाज़ का दीया।
जो वर्षों से तानपुरा भूल गए हैं, वे उसे एक बार फिर मिलाएँ। जो कभी हारमोनियम सीखते थे, वे बस “सा” से शुरुआत करें। जो गाते नहीं, वे किसी गुरु या किसी युवा कलाकार की सभा में पूरे मन से बैठें। और घर के बच्चों को आरती के साथ एक छोटी-सी बंदिश भी सिखाइए।
दीया एक रात जलता है और सुबह बुझ जाता है। पर जो स्वर इस दीपावली आपके भीतर जलेगा, वह अगली दीपावली तक जलता रहेगा।
संगीत जगत परिवार की ओर से आप सभी को दीपों और स्वरों से भरी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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